आयुर्वेद का इतिहास

संसार की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद है। विद्वानों ने आयुर्वेद के इतिहास का रचनाकाल 3 हजार से लेकर 50 हजार वर्ष पूर्व तक माना है। ऋग्वेद सहिंता में ही आयुर्वेद के सिद्धांत यत्र तत्र विकीर्ण हैं। चरक, सुश्रुत, कश्यप तथा तमाम आयुर्वेदिक ग्रंथ आयुर्वेद को अथर्वेद का उपवेद मानते हैं। इसी से यह सिद्ध होता है की आयुर्वेद अत्यंत प्राचीन है। अतः हम यह कह सकते हैं की आयुर्वेद का रचनाकाल 3 हजार ईसा पूर्व से लेकर 50 हजार वर्ष पहले यानी सृष्टि उत्पत्ति के आसपास  है। आचार्य अश्वनी कुमार इस शास्त्र के जनक मानें जाते हैं। जिन्होंने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सर जोड़ा था। यह विद्या अश्वनी कुमार ने इंद्र से सीखी थी। इंद्र ने यह विद्या धन्वन्तरि को भी सिखाई थी। 

आयुर्वेद के प्रमुख आचार्य

1 – अश्वनी कुमार।

2 – धन्वन्तरि।

3 – नकुल।

4 – सहदेव।

5 – अर्की।

6 – च्यवन।

7 – जनक।

8 – अगस्त।

7 – अत्रि – शिष्य – अग्निवेश, भेल, जातुकर्ण, पराशर, क्षारपाणि, हारीत।

8 – चरक, सुश्रुत।

आयुर्वेद के 8 भाग

1 – काय चिकित्सा।

2 – शल्य तंत्र।

3 – शालाक्य तंत्र।

4 – कौमार भृत्य।

5 – अगद तंत्र।

6 – भूत विद्या।

7 – रसायन तंत्र।

8 – वाजीकरण तंत्र।

आयुर्वेद की परिभाषा एवं व्याख्या

आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह प्राचीन साहित्य है। जिसके अध्ययन से ही हमें अपनी जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते हैं।

(1) आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः।

अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं।

(2) स्वस्थ व्यक्ति एवं आतुर (रोगी) के लिए उत्तम मार्ग बताने वाला विज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं।

(3) अर्थात जिस शास्त्र में आयु शाखा (उम्र का विभाजन), आयु विद्या, आयुसूत्र, आयु ज्ञान, आयु लक्षण (प्राण होने के चिन्ह), आयु तंत्र (शारीरिक रचना शारीरिक क्रियाएं) – इन सम्पूर्ण विषयों की जानकारी मिलती है वह आयुर्वेद है।

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